Nov 16, 2011


सुकून नहीं मिलता
कोरे कागज़ पर लकीरें खींच कर
सुस्ताने के लिए आँखे मींच कर

घर के कोने से जाला हटाकर
भगवान की तस्वीर पर माला चढ़ाकर

नंगे बदन पर कपड़े लपेट कर
बिखरी चीज़ें फिर से समेट कर

ख़ामोशी के सफ़र को गीतों से तोड़कर
टूटे हुए सिरों को फिर से जोड़कर

रेत की घड़ी का सिरा उलटकर
हारी बाज़ी का पासा पलटकर

तुमने ठीक ही कहा था
तन्हाई में कैसा भी वक़्त अच्छा नहीं होता
(14 November, 2011 : 3:40AM)
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